छिन्नमस्ता तंत्र मंत्र साधना

दस महाविद्याओं में छिन्नमस्तिका माता छठी महाविद्या कहलाती हैं। देवी के इस रूप के विषय में कई पौराणिक धर्म ग्रंथों में उल्लेख मिलता है।मार्कंडेय पुराण व शिवपुराण में देवी के इस रूप का विशद वर्णन किया गया है। इनके अनुसार जब देवी ने चंडी का रूप धरकर राक्षसों का संहार किया, दैत्यों को परास्त करके देवों को विजय दिलवाई तो चारों ओर उनका जयघोष होने लगा, परंतु देवी की सहायक योगिनिया (सखियां) अजया और विजया की रुधिर पिपासा शांत नहीं हो पाई थी।

इन भैरवियों ने तो साक्षात् जगदम्बा को भी नहीं छोड़ा। भगवती पार्वती मानसरोवर के पवित्र जल में स्नान कर रहीं थीं। ऋतु स्नान के पश्चात् वे परमशिव से मिलन की इच्छा में थी।

किंतु उनकी सहचरी जया-विजया ने भूख-भूख चिल्लाना शुरू कर दिया – माँ हमें भूख लगी है। ये भैरवियाँ ताना मारती हैं।

इन्होंने कहा – साक्षात् जगदम्बा, अन्नपूर्णा की सहेलियाँ होकर भी हम भूखी हैं, जो सारे संसार का भरण-पोषण करती हैं, वे ही महादेवी हम लोगों को तृप्त नहीं कर सकती।

बस आदिशक्ति महामाया को क्रोध ही नहीं बल्कि महाक्रोध आ गया, और खड्ग से अपना ही सिर काट लिया। उनके गर्दन से रक्त की तीन धारायें प्रवाहित होने लगीं और वे दोनों भैरवियाँ रक्त पान कर के ही मानीं। इस प्रकार संसार में प्रथम भैरवियों की उत्पत्ति हुई। इस प्रकार छिन्नमस्तिका देवी की उत्पत्ति हुई और सखियाँ डाकिनी एवं शाकिनी कहलाईं।

इस पर उनकी रक्त पिपासा को शांत करने के लिए मां ने अपना मस्तक काटकर अपने रक्त से उनकी प्यास बुझाई। इससे माता को छिन्नमस्तिका नाम से भी पुकारा जाने लगा। माना जाता है कि जहां भी देवी छिन्नमस्तिका का निवास होता है, वहां पर चारों ओर भगवान शिव का स्थान भी होता है।

देवी छिन्नमस्तिका का तेज और प्रताप पुराणों में स्पष्ट रूप से दर्ज है। जितनी व दुष्टों की संघारक हैं उतनी ही अपने भक्तों के लिए दयालू भी हैं। देवी की साधना जिस भाव से की जाए वे उसी रूप में दर्शन देती हैं। फिर चाहे वह शांत भाव हो या गुस्सैल। और उसका परिणाम भी उसी के अनुरूप होता है।फिर देवी ने अपनी कटार से अपना सिर छेदन कर दिया, छिन्न सिर देवी के बाएं हाथ पर आ गिरा, उनके कबन्ध से रक्त की तीन धाराएं निकली। दो धाराएं उनकी सहचरी डाकिनी और वर्णिनी के मुख में गई तथा तीसरी धारा का छिन्न शिर से स्वयं पान करने लगी।

साधना विधान : –

सर्व प्रथम मंत्र सिद्ध साधना सामग्री लेकर साधना शुरू करें.

इस साधना को छिन्नमस्ता जयन्ती अथवा किसी भी मंगलवार से आरम्भ किया जा सकता है। आप चाहे तो इस साधना को नवरात्रि के प्रथम दिन से भी शुरु कर सकते हैं। यह साधना रात्रि काल में ही सम्पन्न की जाती है, अतः मन्त्र जाप रात्रि में ही किया जाए अर्थात यह साधना रात्रि को दस बजे आरम्भ करके प्रातः लगभग तीन या चार बजे तक समाप्त करनी चाहिए।

इस साधना को पूरा करने के लिए सवा लाख मन्त्र जाप सम्पन्न करना चाहिए और यह साधना ग्यारह या इक्कीस दिनों में पूरी होनी चाहिए।

रात्रि को लगभग दस बजे स्नान करके काली अथवा नीली धोती धारण कर लें। फिर साधना कक्ष में जाकर दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके काले या नीले ऊनी आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने किसी बाजोट पर काला अथवा नीला वस्त्र बिछाकर उस पर माँ भगवती छिन्नमस्ता यंत्र स्थापित कर लें। इसके साथ ही गणपति और भैरव के प्रतीक रूप में दो सुपारी क्रमशः अक्षत एवं काले तिल की ढेरी पर स्थापित कर दें।

अब सबसे पहले साधक शुद्ध घी का दीपक प्रज्ज्वलित कर धूप-अगरबत्ती भी लगा दे। फिर सामान्य गुरुपूजन सम्पन्न करें तथा गुरुमन्त्र की कम से कम चार माला जाप करें। फिर सद्गुरुदेवजी से छिन्नमस्ता साधना सम्पन्न करने की अनुमति लें और उनसे साधना की निर्बाध पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।

इसके बाद साधक संक्षिप्त गणपति पूजन सम्पन्न करें और

“ॐ वक्रतुण्डाय हुम्”

मन्त्र का एक माला जाप करें। फिर भगवान गणपतिजी से साधना की निर्विघ्न पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।तत्पश्चात साधक सामान्य

भैरवपूजन सम्पन्न करें और

“ॐ हूं क्रोधभैरवाय हूं फट्”

मन्त्र का एक माला जाप करें। फिर भगवान क्रोध भैरवजी से साधना की निर्बाध पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।

इसके बाद साधना के पहले दिन साधक को संकल्प अवश्य लेना चाहिए। इसके लिए दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि

“मैं अमुक नाम का साधक अमुक गौत्र

..गुरू जी …का शिष्य होकर आज से श्री छिन्नमस्ता साधना का अनुष्ठान प्रारम्भ कर रहा हूँ। मैं नित्य २१ दिनों तक ६० माला मन्त्र जाप करूँगा। हे, माँ! आप मेरी साधना को स्वीकार कर मुझे इस मन्त्र की सिद्धि प्रदान करें और इसकी ऊर्जा को आप मेरे भीतर स्थापित कर दें।”

ऐसा कह कर हाथ में लिया हुआ जल जमीन पर छोड़ देना चाहिए। इसके बाद प्रतिदिन संकल्प लेने की आवश्यकता नहीं है।

तदुपरान्त साधक माँ भगवती छिन्नमस्ता यन्त्र का सामान्य पूजन करे। उस पर कुमकुम, अक्षत और पुष्प चढ़ावें। किसी मिष्ठान्न का भोग लगाएं। उसके सामने दीपक और लोबान धूप जला लें।

सबसे महत्पूरण होता है देवी का महायंत्र जिसके बिना साधना कभी पूरण नहीं होती इसलिए देवी के यन्त्र को जरूर स्थापित करे व पूजन करें

यन्त्र के पूजन की रीति है-

पंचोपचार पूजन करें-धूप,दीप,फल,पुष्प,जल आदि चढ़ाएं

ॐ कबंध शिवाय नम: मम यंत्रोद्दारय-द्दारय

कहते हुये पानी के 21 बार छीटे दें व पुष्प धूप अर्पित करें

फिर साधक दाहिने हाथ में जल लेकर निम्न विनियोग मन्त्र पढ़ें

—विनियोग :—–

ॐ अस्य श्री शिरच्छिन्नामन्त्रस्य भैरव ऋषिः सम्राट् छन्दः श्री छिन्नमस्ता देवता ह्रींकारद्वयं बीजं स्वाहा शक्तिः मम् अभीष्ट कार्य सिध्यर्थे जपे विनियोगः।

ऋष्यादिन्यास :—–

ॐ भैरव ऋषयै नमः शिरसि। (सिर को स्पर्श करें)
ॐ सम्राट् छन्दसे नमः मुखे। (मुख को स्पर्श करें)
ॐ श्री छिन्नमस्ता देवतायै नमः हृदये। (हृदय को स्पर्श करें)
ॐ ह्रीं ह्रीं बीजाय नमो गुह्ये। (गुह्य स्थान को स्पर्श करें)
ॐ स्वाहा शक्तये नमः पादयोः। (पैरों को स्पर्श करें)
ॐ ममाभीष्ट कार्य सिद्धयर्थये जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे। (सभी अंगों को स्पर्श करें)

करन्यास :—–

ॐ आं खड्गाय स्वाहा अँगुष्ठयोः। (दोनों तर्जनी उंगलियों से दोनों अँगूठे को स्पर्श करें)
ॐ ईं सुखदगाय स्वाहा तर्जन्योः। (दोनों अँगूठों से दोनों तर्जनी उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ ऊं वज्राय स्वाहा मध्यमयोः। (दोनों अँगूठों से दोनों मध्यमा उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ ऐं पाशाय स्वाहा अनामिकयोः। (दोनों अँगूठों से दोनों अनामिका उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ औं अंकुशाय स्वाहा कनिष्ठयोः। (दोनों अँगूठों से दोनों कनिष्ठिका उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ अ: सुरक्ष रक्ष ह्रीं ह्रीं स्वाहा करतलकर पृष्ठयोः। (परस्पर दोनों हाथों को स्पर्श करें)

हृदयादिन्यास :—–

ॐ आं खड्गाय हृदयाय नमः स्वाहा। (हृदय को स्पर्श करें)
ॐ ईं सुखदगाय शिरसे स्वाहा स्वाहा। (सिर को स्पर्श करें)
ॐ ऊं वज्राय शिखायै वषट् स्वाहा। (शिखा को स्पर्श करें)
ॐ ऐं पाशाय कवचाय हूं स्वाहा। (भुजाओं को स्पर्श करें)
ॐ औं अंकुशाय नेत्रत्रयाय वौषट् स्वाहा। (नेत्रों को स्पर्श करें)
ॐ अ: सुरक्ष रकव्यापक न्यास :—–

ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्रवेरोचनियै ह्रींह्रीं फट् स्वाहा मस्तकादि पादपर्यन्तम्।
ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्रवेरोचनियै ह्रीं ह्रीं फट् स्वाहा पादादि मस्तकान्तम्।

इससे तीन बार न्यास करें।

इसके बाद साधक हाथ जोड़कर निम्न ध्यान मन्त्र से भगवती छिन्नमस्ता का ध्यान करें —

ध्यान :–

ॐ भास्वन्मण्डलमध्यगां निजशिरश्छिन्नं विकीर्णालकम्
स्फारास्यं प्रपिबद्गलात् स्वरुधिरं वामे करे बिभ्रतीम्।
याभासक्तरतिस्मरोपरिगतां सख्यौ निजे डाकिनी
वर्णिन्यौ परिदृश्य मोदकलितां श्रीछिन्नमस्तां भजे।।

इसके बाद साधक भगवती छिन्नमस्ता के मूलमन्त्र का रद्राक्ष माला से ६० माला जाप करें —

मन्त्र :———-

।। ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै ह्रीं ह्रीं फट् स्वाहा ।।

OM SHREEM HREEM HREEM KLEEM AIM VAJRA VAIROCHANEEYEI HREEM HREEM PHAT SWAAHA.

मन्त्र जाप के उपरान्त साधक निम्न सन्दर्भ का उच्चारण करने के बाद एक आचमनी जल छोड़कर सम्पूर्ण जाप भगवती छिन्नमस्ता को समर्पित कर दें।

ॐ गुह्यातिगुह्य गोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपं।
सिद्धिर्भवतु मे देवि! त्वत्प्रसादान्महेश्वरि।।

इस प्रकार यह साधना क्रम साधक नित्य २१ दिनों तक निरन्तर सम्पन्न करें।

जब पूरे सवा लाख मन्त्र जाप हो जाएं, तब पलाश के पुष्प अथवा बिल्व के पुष्पों से दशांश हवन करें। ऐसा करने पर यह साधना सिद्ध हो जाती है।

नैवेध्य मन्त्र :

।। ॐ सिद्धिप्रदे वर्णनीये सर्वसिद्धिप्रदे डाकिनीये छिन्नमस्ते देवि एहि एहि इमं बलिं ग्रह ग्रह मम सिद्धिं कुरु कुरु हूं हूं फट स्वाहा ।।

साधना नियम :———-

१. ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें।
२. एक समय फलाहार लें, अन्न लेना वर्जित है।
३. मन्त्र जाप समाप्ति के बाद उसी स्थान पर सो जाएं।
४. साधना काल में साधक अन्य कोई कार्य, नौकरी, व्यापार आदि न करे।

छिन्नमस्ता साधना सौम्य साधना है और आज के भौतिक युग में इस साधना की नितान्त आवश्यकता है। इस साधना के द्वारा साधक जहाँ पूर्ण भौतिक सुख प्राप्त कर सकता है, वहीं वह आध्यात्मिक क्षेत्र में भी पूर्णता प्राप्त करने में समर्थ होता है। साधक कई साधनाओं में स्वतः सफलता प्राप्त कर लेता है और इस साधना के द्वारा कई-कई जन्मों के पाप कटकर वह निर्मल हो जाता है। यह साधना अत्यधिक सरल, उपयोगी और आश्चर्यजनक सफलता देने में समर्थ है।

छिन्नमस्ता बीज मंत्र का मतलब

“श्रीं” यह लक्ष्मी बीज है।

“ह्रीं” यह लज्जा बीज है, जोकि जीवन में सभी दृष्टियों से उन्नति में सहायक है।
“क्लीं” यह मनोभव बीज है, जोकि समस्त पापों का नाश करने वाला है।
“ऐं” यह जीवन में समस्त गुणों को देने वाला और संजीवनी विद्या प्रदान करने वाला बीज है।
“वं” यह वरुण देव का प्रतीक है, जिससे स्वयं के शरीर पर नियंत्रण रहता है और अपने स्वरूप को कई रूपों में विभक्त कर सकता है।
“जं” यह इन्द्र का प्रतीक है, जिससे स्वयं के शरीर पर नियंत्रण रहता है और अपने स्वरूप को कई रूपों में विभक्त कर सकता है।
“रं” यह रेफ युक्त है, जोकि अग्नि देव का प्रतीक है, यह बीज जीवन की पूर्णता का प्रतीक है।
“वं” यह पृथ्वी पति बीज है, जिससे की साधक पूरी पृथ्वी पर नियंत्रण करने में समर्थ का प्रतीक है।
‘ऐं” यह त्रिपुरा देवी का प्रतीक है।
“रं” यह त्रिपुर सुन्दरी का बीजाक्षर है।
‘ओं” यह सदैव त्रैलोक्य विजयिनी देवी का आत्म रूप प्रतीक है।
“चं” चन्द्र का प्रतीक है जोकि पूरे शरीर को नियंत्रित, सुन्दर व सुखी रखता है।
‘नं” यह गणेश का प्रतीक है जोकि ऋद्धि-सिद्धि देने में समर्थ है।
“ईं” यह साक्षात् कमला का बीजाक्षर है।
“यं’ सरस्वती का बीज है, जिससे साधक को वाक् सिद्धि होती है।
“हुं” हुं यह माला युग्म बीज है, जो आत्म और प्रकृति का संगम है, इससे साधक सम्पूर्ण प्रकृति पर नियंत्रण स्थापित करता है।
“फट्” यह वैखरी प्रतीक है, जिससे साधक किसी भी क्षण मनोवांछित कार्य सम्पन्न कर सकता है।
“स्वा” यह कामदेव का बीज है, जिससे साधक का शरीर सुन्दर, स्वस्थ वा आकर्षक बन जाता है।
“हा” यह रति बीज है, जोकि पूर्ण पौरुष प्रदान करने में समर्थ है।इस प्रकार इन सोलह अक्षरों से स्पष्ट होता है कि मंत्र का प्रत्येक अक्षर विशेष शक्तिशाली है और इस एक ही मंत्र से भौतिक एवं आध्यात्मिक सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं।

देवी के दो प्रमुख रूपों के दो महामंत्र

१)देवी प्रचंड चंडिका मंत्र-ऐं श्रीं क्लीं ह्रीं ऐं वज्र वैरोचिनिये ह्रीं ह्रीं फट स्वाहा

२)देवी रेणुका शबरी मंत्र-ॐ श्रीं ह्रीं क्रौं ऐं

सभी मन्त्रों के जाप से पहले कबंध शिव का नाम लेना चाहिए तथा उनका ध्यान करना चाहिएअब देवी के

कुछ इच्छा पूरक मंत्र

1) देवी छिन्नमस्ता का शत्रु नाशक मंत्र

ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं वज्र वैरोचिनिये फट

लाल रंग के वस्त्र और पुष्प देवी को अर्पित करें

नवैद्य प्रसाद,पुष्प,धूप दीप आरती आदि से पूजन करें

रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें

देवी मंदिर में बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है

काले रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें

दक्षिण दिशा की ओर मुख रखें

अखरो व अन्य फलों का फल प्रसाद रूप में चढ़ाएं

2) देवी छिन्नमस्ता का धन प्रदाता मंत्र

ऐं श्रीं क्लीं ह्रीं वज्रवैरोचिनिये फट

गुड, नारियल, केसर, कपूर व पान देवी को अर्पित करें) देवी छिन्नमस्ता का प्रेम प्रदाता मंत्र

ॐ आं ह्रीं श्रीं वज्रवैरोचिनिये हुम

देवी पूजा का कलश स्थापित करें

देवी को सिन्दूर व लोंग इलायची समर्पित करें

रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें

किसी नदी के किनारे बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है

भगवे रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें

उत्तर दिशा की ओर मुख रखें

खीर प्रसाद रूप में चढ़ाएं

4) देवी छिन्नमस्ता का सौभाग्य बर्धक मंत्र

ॐ श्रीं श्रीं ऐं वज्रवैरोचिनिये स्वाहा

देवी को मीठा पान व फलों का प्रसाद अर्पित करना चाहिए

रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करें

किसी ब्रिक्ष के नीचे बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है

संतरी रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें

पूर्व दिशा की ओर मुख रखें

पेठा प्रसाद रूप में चढ़ाएं

5) देवी छिन्नमस्ता का ग्रहदोष नाशक मंत्र

ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं वं वज्रवैरोचिनिये हुम

देवी को पंचामृत व पुष्प अर्पित करें

रुद्राक्ष की माला से 4 माला का मंत्र जप करें

मंदिर के गुम्बद के नीचे या प्राण प्रतिष्ठित यंत्र के निकट बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है

पीले रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें

उत्तर दिशा की ओर मुख रखें

छिन्नमस्ता हवन यज्ञ

छिन्नमस्ता हवन यज्ञ

इस मंत्र से काम्य प्रयोग भी संपन्न किये जाते हैं व देवी को पुष्प अत्यंत प्रिय हैं इसलिए केवल पुष्पों के होम से ही देवी कृपा कर देती है,आप भी मनोकामना के लिए यज्ञ कर सकते हैं.

मंत्र उच्चारण करने के छिन्नमस्ता कवच पढ़ें. दी गई यह महाविद्या Maa Chinnamasta Sadhana 11 या 21 दिनों की साधना है !

Maa Chinnamasta Sadhana करते समय साधक पूर्ण आस्था के साथ नियमों का पालन जरुर करें ! और नित्य जाप करने से पहले ऊपर दी गई संक्षिप्त पूजन विधि जरुर करें ! साधक Maa Chinnamasta Sadhana करने की जानकारी गुप्त रखें ! ग्यारह या 21 दिनों के बाद मन्त्रों का जाप करने के बाद दिए गये मन्त्र जिसका आपने जाप किया हैं उस मन्त्र का दशांश ( 10% भाग ) हवन अवश्य करें ! हवन में कमल गट्टे, पंचमेवा, काले तिल, पलाश पुष्प या बिल्व पुष्पों, शुद्ध घी व् हवन सामग्री को मिलाकर आहुति दें !

जैसे-

1. मालती के फूलों से होम करने पर बाक सिद्धि होती है व चंपा के फूलों से होम करने पर सुखों में बढ़ोतरी होती है

2.बेलपत्र के फूलों से होम करने पर लक्ष्मी प्राप्त होती है व बेल के फलों से हवन करने पर अभीष्ट सिद्धि होती है

3.सफेद कनेर के फूलों से होम करने पर रोगमुक्ति मिलती है तथा अल्पायु दोष नष्ट हो 100 साल आयु होती है

4. लाल कनेर के पुष्पों से होम करने पर बहुत से लोगों का आकर्षण होता है व बंधूक पुष्पों से होम करने पर भाग्य बृद्धि होती है

5.कमल के पुष्पों का गऊ के धी के साथ होम करने से बड़ी से बड़ी बाधा भी रुक जाती है

6 .मल्लिका नाम के फूलों के होम से भीड़ को भी बश में किया जा सकता है व अशोक के पुष्पों से होम करने पर पुत्र प्राप्ति होती है

7 .महुए के पुष्पों से होम करने पर सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं व देवी प्रसन्न होती है

महाअंक-

देवी द्वारा उतपन्न गणित का अंक जिसे स्वयं छिन्नमस्ता ही कहा जाता है वो देवी का महाअंक है -“4”

विशेष पूजा सामग्रियां-पूजा में जिन सामग्रियों के प्रयोग से देवी की विशेष कृपा मिलाती है

मालती के फूल, सफेद कनेर के फूल, पीले पुष्प व पुष्पमालाएं चढ़ाएं

केसर, पीले रंग से रंगे हुए अक्षत, देसी घी, सफेद तिल, धतूरा, जौ, सुपारी व पान चढ़ाएं

बादाम व सूखे फल प्रसाद रूप में अर्पित करें

सीपियाँ पूजन स्थान पर रखें

भोजपत्र पर ॐ ह्रीं ॐ लिख करा चडाएं

दूर्वा,गंगाजल, शहद, कपूर, रक्त चन्दन चढ़ाएं, संभव हो तो ताम्बे के पात्रों का ही पूजन में प्रयोग करें.

हवन के बाद छिन्नमस्ता यंत्र को अपने घर से दक्षिण दिशा की तरफ़ किसी काली मंदिर में दान कर दें और बाकि बची हुई पूजा सामग्री को नदी या किसी पीपल के नीचे विसर्जन कर आयें ! ऐसा करने से साधक की Maa Chinnamasta Sadhana पूर्ण हो जाती हैं ! और साधक के ऊपर माँ छिन्नमस्ता देवी की कृपा सदैव बनी रही हैं , करने से साधक के जीवन में शत्रु, भय, रोग, बाधा जैसी समस्या नहीं रहती हैं !

छिन्नमस्ता देवी कवच

छिन्नमस्ता देवी कवच

छिन्नमस्ता कवच

साधकों को मां छिन्नमस्ता का जप करने से पहले कवच का पाठ अवश्य करना चाहिए। यह एक बहुत ही उच्चकोटि की एवं उग्र साधना है, इसलिए सर्वप्रथम किसी योग्य गुरू से दीक्षा अवश्य ग्रहण करें । किताबों से पढकर यह साधना करने का प्रयास कदापि न करें। जो साधक कुण्डलिनी जागरण में रूचि रखते हैं उन्हें छिन्नमस्ता साधना अवश्य करनी चाहिए। मां छिन्नमस्ता की साधना से योग की सिद्धि भी सरलता से मिल जाती है। बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान इस साधना से सम्भव है। मां छिन्नमस्ता आप पर कृपा करें।

श्रीगणेशाय नमः।
देव्युवाच।
कथिताश्छिन्नमस्ताया या या विद्याः सुगोपिताः।
त्वया नाथेन जीवेश श्रुताश्चाधिगता मया॥ १॥
इदानीं श्रोतुमिच्छामि कवचं सर्वसूचितम्।
त्रैलोक्यविजयं नाम कृपया कथ्यतां प्रभो॥ २॥
भैरव उवाच।
श्रुणु वक्ष्यामि देवेशि सर्वदेवनमस्कृते।
त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं सर्वमोहनम्॥ ३॥
सर्वविद्यामयं साक्षात्सुरासुर जयप्रदम्।
धारणात्पठनादीशस्त्रैलोक्यविजयी विभुः॥ ४॥
ब्रह्मा नारायणो रुद्रो धारणात्पठनाद्यतः।
कर्ता पाता च संहर्ता भुवनानां सुरेश्वरि॥ ५॥
न देयं परशिष्येभ्योऽभक्तेभ्योऽपि विशेषतः।
देयं शिष्याय भक्ताय प्राणेभ्योऽप्यधिकाय च॥ ६॥
देव्याश्च च्छिन्नमस्तायाः कवचस्य च भैरवः।
ऋषिस्तु स्याद्विराट् छन्दो देवता च्छिन्नमस्तका॥ ७॥
त्रैलोक्यविजये मुक्तौ विनियोगः प्रकीर्तितः।
हुंकारो मे शिरः पातु छिन्नमस्ता बलप्रदा॥ ८॥
ह्रां ह्रूं ऐं त्र्यक्षरी पातु भालं वक्त्रं दिगम्बरा।
श्रीं ह्रीं ह्रूं ऐं दृशौ पातु मुण्डं कर्त्रिधरापि सा॥ ९॥
सा विद्या प्रणवाद्यन्ता श्रुतियुग्मं सदाऽवतु।
वज्रवैरोचनीये हुं फट् स्वाहा च ध्रुवादिका॥ १०॥
घ्राणं पातु च्छिन्नमस्ता मुण्डकर्त्रिविधारिणी।
श्रीमायाकूर्चवाग्बीजै र्वज्रवैरोचनीय हूं॥ ११॥
हूं फट् स्वाहा महाविद्या षोडशी ब्रह्मरूपिणी।
स्वपार्श्वे वर्णिनी चासृग्धारां पाययती मुदा॥ १२॥
वदनं सर्वदा पातु च्छिन्नमस्ता स्वशक्तिका।
मुण्डकर्त्रिधरा रक्ता साधकाभीष्टदायिनी॥ १३॥
वर्णिनी डाकिनीयुक्ता सापि मामभितोऽवतु।
रामाद्या पातु जिह्वां च लज्जाद्या पातु कण्ठकम्॥ १४॥
कूर्चाद्या हृदयं पातु वागाद्या स्तनयुग्मकम्।
रमया पुटिता विद्या पार्श्वौ पातु सुरेश्र्वरी॥ १५॥
मायया पुटिता पातु नाभिदेशे दिगम्बरा।
कूर्चेण पुटिता देवी पृष्ठदेशे सदाऽवतु॥ १६॥

वाग्बीजपुटिता चैषा मध्यं पातु सशक्तिका।
ईश्वरी कूर्चवाग्बीजै र्वज्रवैरोचनीय हूं॥ १७॥
हूं फट् स्वाहा महाविद्या कोटिसूर्य्यसमप्रभा।
छिन्नमस्ता सदा पायादुरुयुग्मं सशक्तिका॥ १८॥
ह्रीं ह्रूं वर्णिनी जानुं श्रीं ह्रीं च डाकिनी पदम्।
सर्वविद्यास्थिता नित्या सर्वाङ्गं मे सदाऽवतु॥ १९॥
प्राच्यां पायादेकलिङ्गा योगिनी पावकेऽवतु।
डाकिनी दक्षिणे पातु श्रीमहाभैरवी च माम्॥ २०॥
नैरृत्यां सततं पातु भैरवी पश्चिमेऽवतु।
इन्द्राक्षी पातु वायव्येऽसिताङ्गी पातु चोत्तरे॥ २१॥
संहारिणी सदा पातु शिवकोणे सकर्त्रिका।
इत्यष्टशक्तयः पान्तु दिग्विदिक्षु सकर्त्रिकाः॥ २२॥
क्रीं क्रीं क्रीं पातु सा पूर्वं ह्रीं ह्रीं मां पातु पावके।
ह्रूं ह्रूं मां दक्षिणे पातु दक्षिणे कालिकाऽवतु॥ २३॥
क्रीं क्रीं क्रीं चैव नैरृत्यां ह्रीं ह्रीं च पश्चिमेऽवतु।
हूं हूं पातु मरुत्कोणे स्वाहा पातु सदोत्तरे॥ २४॥
महाकाली खड्गहस्ता रक्षःकोणे सदाऽवतु।
तारो माया वधूः कूर्चं फट्कारोऽयं महामनुः॥ २५॥
खड्गकर्त्रिधरा तारा चोर्ध्वदेशं सदाऽवतु।
ह्रीं स्त्रीं हूं फट् च पाताले मां पातु चैकजटा सती।
तारा तु सहिता खेऽव्यान्महानीलसरस्वती॥ २६॥
इति ते कथितं देव्याः कवचं मन्त्रविग्रहम्।
यद् धृत्वा पठनाद्भीमः क्रोधाख्यो भैरवः स्मृतः॥ २७॥
सुरासुर मुनीन्द्राणां कर्ता हर्ता भवेत्स्वयम्।
यस्याज्ञया मधुमती याति सा साधकालयम्॥ २८॥
भूतिन्याद्याश्च डाकिन्यो यक्षिण्याद्याश्च खेचराः।
आज्ञां गृह्णंति तास्तस्य कवचस्य प्रसादतः॥ २९॥
एतदेव परं ब्रह्मकवचं मन्मुखोदितम्।
देवीमभ्यर्च्य गन्धाद्यैर्मूलेनैव पठेत्सकृत्॥ ३०॥
संवत्सरकृतायास्तु पूजायाः फलमाप्नुयात्।
भूर्जे विलिखितं चैतद् गुटिकां काञ्चनस्थिताम्॥ ३१॥
धारयेद्दक्षिणे बाहौ कण्ठे वा यदि वान्यतः।
सर्वैश्वर्ययुतो भूत्वा त्रैलोक्यं वशमानयेत्॥ ३२॥
तस्य गेहे वसेल्लक्ष्मीर्वाणी च वदनाम्बुजे।
ब्रह्मास्त्रादीनि शस्त्राणि तद्गात्रे यान्ति सौम्यताम्॥ ३३॥
इदं कवचमज्ञात्वा यो भजेच्छिन्नमस्तकाम्।
सोऽपि शस्त्रप्रहारेण मृत्युमाप्नोति सत्वरम्॥ ३४॥
॥ इति श्रीभैरवतन्त्रे भैरवभैरवीसंवादे
त्रैलोक्यविजयं नाम छिन्नमस्ताकवचं सम्पूर्णम्॥

Chhinnamasta Video छिन्नमस्ता देवी

Das Maha Vidhaya 10 Great goddess of universe.

Chinnamasta Devi
  1. महाकाली तंत्र मंत्र साधना
  2. तारा देवी मंत्र तंत्र साधना
  3. त्रिपुरा सुंदरी तंत्र मंत्र साधना
  4. भुव्ने्श्वरी देवी तंत्र मंत्र साधना
  5. भैरवी देवी/लिंग भैरवी मंत्र साधना
  6. छिन्नमस्ता देवी तंत्र मंत्र साधना
  7. घुमावती देवी तंत्र मंत्र साधना
  8. बगलामुखी मंत्र साधना
  9. मातंगी देवी तंत्र मंत्र साधना
  10. कमला लक्ष्मी देवी मंत्र साधना